लॉकडाउन में अमानवीयता ने लांघी अपनी चरम सीमा!

"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः"

अर्थात जहां स्त्रियों की पूजा(सम्मान) होता है ,वहीं देवता निवास करते हैं।
इस बात को हमने तमाम बार सुना है,पर क्या हम इसे अपने जीवन में उतार पाए हैं?

देवी का नमन और देवी जैसी का दमन:-


हमनें देवियों की पूजा, उनका सम्मान तो कर लिया पर जिन औरतों को देवी मानने का ढोंग हम करते हैं, उनका अपमान करने में हमने कोई कसर नहीं छोड़ी। हमारा समाज तमाम परंपराओं और संस्कृतियों से बना एक खूबसूरत इंद्रधनुष है। इसके कई रंग उजले हैं तो कुछ रंग इतने मेले हैं जिन्होंने कई लोगों की जिंदगियों को झकझोर कर रख दिया है। ऐसा ही एक रंग है- औरतों के शोषण का, उनपर सदियों से होते आ रहे अत्याचार का। चाहें बात सीता, उर्मिला, कुंती या सत्यवती जैसी महिलाओं की हो,जिनकी दुर्दशा और पीड़ा की कई कहानियां हमने सुनी हैं या बनारस और वृंदावन जैसे तीर्थ स्थलों पर मौजूद विधवाओं की जिनका हर पल शोषण हो रहा है या फिर आजादी के समय मौजूद उन हजारों औरतों की जो अपहरण और बलात्कार का शिकार हुईं। हमारे इतिहास में
 तमाम ऐसे उदाहरण हैं जो यह बयां करते हैं कि जब भी कभी कोई प्राकृतिक आपदा, महामारी या युद्ध जैसे संकट आते हैं तो इसकी सबसे ज्यादा शिकार होती हैं.."महिलाएं"।
आज भी जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस के इस संकट से जूझ रही है तब भी इसकी सबसे बड़ी कीमत "महिलाओं" को ही चुकानी पड़ रही है। कोरोना वायरस से संक्रमित महिलाओं के आंकड़े तो पुरुषों के मुकाबले कुछ कम है पर घरों के अंदर जो हिंसा महिलाओं को झेलना पड़ रहा है, उसमें कोई कमी नहीं है।
इंडिया टुडे से एक बातचीत में दिल्ली की घरेलू हिंसा से पीड़ित एक महिला बताती हैं कि "मेरे पति एक पान की दुकान में काम करते थे और मैं एक नौकरानी के रूप में काम करती थी. हमारी दो छोटी बेटियां हैं. लॉकडाउन के बाद से पति के पास नौकरी नहीं है. हमारे पास भोजन और पैसे भी नहीं है.मेरे पति पहले मेरे साथ दुर्व्यवहार करते थे और कभी-कभी पीटते भी थे, लेकिन लॉकडाउन के कारण वो घर पर हैं और लगभग हर रोज मुझे पीटते हैं. वह मुझ पर अपनी भड़ास निकालते हैं. मैं शिकायत करने के लिए भी बाहर नहीं जा सकती. मेरे और मेरे बच्चों के लिए घरेलू यातना महामारी से काफी बदतर है"।
ऐसे कई उदाहरण है जिसमें घरों में बंद पति अपना गुस्सा अपनी पत्नियों पर उतार रहे हैं और पत्नियों को इस वक्त इससे बचने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है।

क्या कहते हैं आंकड़े?

राष्ट्रीय महिला आयोग के आंकड़ों के मुताबिक मार्च के पहले हफ्ते में इस तरह के अपराध से जुड़ी 116 शिकायतें आई थी। वहीं लॉकडाउन के बाद (यानी 23 मार्च से 1अप्रैल तक) यह आंकड़ा दोगुने से भी ज्यादा होकर 257 पहुंच गया। इस दौरान महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा की कुल 69 शिकायतें, साइबर अपराध के 15 मामले, रेप या रेप की कोशिश के 13 मामले और सम्मान के साथ जीने के अधिकार की 77 शिकायतें दर्ज कराई गईं।

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष, "रेखा शर्मा" बताती हैं कि यह बस उन शिकायतों के आंकड़े हैं, जो फोन के माध्यम से दर्ज़ कराई गई हैं। हमारे समाज के निचले तबके की काफ़ी ऐसी महिलाएं हैं जो डाक के जरिए अपनी शिकायतें भेजती हैं, पर इस वक्त लॉकडाउन की वजह से यह शिकायतें उन तक नहीं पहुंच पा रही हैं। इसके अलावा कई ऐसी महिलाएं भी होंगी जो शिकायत ही दर्ज नहीं करा रहीं क्योंकि इस दौरान मारपीट करने वाले उनके सामने ही रहते होंगे। इन्हीं वजहों से आयोग की अध्यक्ष का मानना है कि जो सटीक आंकड़े हैं वह इससे कहीं ज्यादा हो सकते हैं।

घरेलू हिंसा के बढ़ते आंकड़ों की वजह:-

एक बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों हर दिन यह आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं? क्यों इस मुश्किल घड़ी में भी लोग एक दूसरे के साथ नहीं बल्कि एक दूसरे से इतने परेशान हैं?

परिवारों में बढ़ता तनाव और अवसाद:

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब लोग काम के लिए बाहर निकलते हैं तो यह परिवारों की सिर्फ आर्थिक मदद ही नहीं करता बल्कि भावनात्मक मदद भी करता है। पर अब लॉकडाउन की वजह से लोगों को मजबूरन घरों में रहना पड़ रहा है जो उनमें चिड़चिड़ापन पैदा कर रहा है। इसके अलावा देश एक बड़ी आबादी आर्थिक संकट से भी जूझ रही है। लोगों के सामने नौकरी की अनिश्चितता भी इस मानसिक तनाव और अवसाद की बड़ी वजह है, जिसका शिकार महिलाएं आए दिन हो रही हैं।

पितृसत्तात्मक सोच:

एक प्रसिद्ध समाजशास्त्री सिल्विया वाल्बे के अनुसार:-
"पितृसत्ता सामाजिक संरचना की ऐसी व्यवस्था है, जिसमें पुरुष, महिला पर अपना प्रभुत्व जमाता है, उसका दमन करता है और उसका शोषण करता है।"


महिला और पुरुष का एक बड़ा फ़र्क हमारे समाज के लोगों की सोच में हमेशा ही रहा है। घरेलू हिंसा की वजह भी यही पितृसत्तात्मक सोच है जिसमें महिलाओं को पुरुषों से कम आंका जाता है। लॉकडाउन में यह हिंसा इसीलिए बढ़ रही है क्युकी पहले काम की वजह से पुरुषों को ज्यादातर समय बाहर ही रहना पड़ता था तो महिलाओं को कुछ वक्त के लिए इस सोच से आज़दी मिल जाती थी पर अब जब सभी पूरे दिन घर में बंद हैं तो पुरुषों की यह सोच महिलाओं पर हावी होती जा रही है। इसी सोच की वजह से महिलाओं के सामने आज दोहरी चुनौती खड़ी है। एक ओर उन्हें इस महामारी से लड़ना है तो दूसरी तरफ खुद को शोषण से बचाना भी है।
सभी को ये समझना होगा कि समाज की इस विचारधारा में तब तक सुधार नहीं आ सकता जब तक हम अपने आप को, अपनी सोच को नहीं बदलेंगे। जब तक हम यह नहीं समझेंगे की स्त्रियां देवी बनने के इच्छुक बिल्कुल भी नहीं हैं, उन्हें बस इंसान ही समझा जाए वही काफ़ी है।

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