बचपन

         
“सपनों का वो आंगन कहां ,
दर्पण बता बचपन कहां ?”

“बचपन” यह शब्द सुनते ही मानो जैसे वक्त का पहिया Rewind mode में चला जाता है और हमें हमारा बीता हुआ वक़्त याद सा  आ जाता है |





सभी के जीवन का सबसे खूबसूरत और यादगार हिस्सा होता है बचपन | न कोई भाग दौड़ न किसी चीज की फिक्र | एक ऐसा दौर होता है बचपन, जहां Candy Floss को बुढ़िया   के बाल कहने पर मज़ाक नहीं बनाया जाता, जब क्लास से बाहर निकाला जाना सजा नहीं मजा होता था, जहां बस ‘मुच्ची’ से बड़े-बड़े झगड़े सुलझाए जाते थे, जहाँ Hide and seek या I-spy नहीं आइस पाईस  होता था |
बारिश में कागज़ की नाव बनाना ही जीवन भर की खुशी दे जाता था | बारिश तो आज भी वही है लेकिन शायद भूल गए सब नाव बनाना कागज़ की |
स्कूल खत्म होते ही माँ से लिए गए दो रुपए की कीमत भी लाखों से कहीं ज़्यादा होती थी | तब तो शीकन्जी और काला खट्टा की खटास भी मीठी सी लगती थी |
"काले गोरे का भेद नहीं,हर दिल से हमारा नाता है"
सच ही है,तब ना ही काले गोरे में कोई भेद होता था, ना ही जाति से कोई फर्क पड़ता था |

जब धूप में खेलने पर भी ना तो बीमारियों की फिक्र होती थी ना ही काले होने का डर |
"चिड़िया उड़, मैना उड़" करते करते  बचपन भी कहां उड़ सा गया पता ही नहीं चला |

Popins में अपनी पसंद के रंग के लिए सब से लड़ जाना,छोटी छोटी खबरों का मोबाइल पर नहीं साइकिल पर आना,मीठी वाली सिगरेट की लत सी लग जाना और शाका लका बूम बूम वाली पेंसिल से अपनी कलाकारियां  दिखाना..




सब कुछ तो था बचपन में,फिर क्यों ही हम बड़े होना चाहते थे?
क्यों पेंसिल की जगह पेन को देना चाहते थे?
सच्चे दोस्तों को क्यों ही  Facebook पर खोजना चाहते थे?


“बचपन चला गया ते जवानी चली गई,
जिंदगी की कीमती निशानी चली गई”

कभी-कभी लगता है कि वह नासमझी ही अच्छी थी, क्यों समझदार हो गए हम, इस छोटी सी दुनिया में न जाने कहां खो गए हम |

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